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Sandhi Kise Kahate Hain

Sandhi Kise Kahate Hain :-दोस्तो आज हम आपको हिंदी में  संधि किसे कहते है? संधि के कितने प्रकार होते है। संधि के प्रकार कौन-कौन से हैं। और इसके साथ यह भी जानेंगे कि (स्वर संधि, दीर्घ संधि, गुण संधि, वृद्धि संधि और यण संधि,) क्या होते हैं। इसके साथ ही व्यंजन और विर्सग संधि के बार में  भी चर्चा करेंगे।

Sandhi Kise Kahate Hain

संधि किसे कहते है?

Sandhi Kise Kahate Hain
Sandhi Kise Kahate Hain

 

संधि में पहले शब्द का अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द का प्रथम वर्ण से एक नया शब्द का निर्माण होता है |

 विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
 जगत + नाथ = जगन्नाथ
 विद्या +आलय = विद्यालय
इस प्रकार विद्यार्थी में प्रथम शब्द का अंतिम वर्ण द्या (जिसमे आ की ध्वनि प्रतीत हो रही है ) जबकि दूसरे शब्द का प्रथम वर्ण में अ की ध्वनि प्रतीत हो रही है। तो इस प्रकार दोनों मिलकर एक नया शब्द का निर्माण करते है जो विद्यार्थी है। और संधि के नियमों द्वारा बने वर्णों को वापस अपने मूल अवस्था में लेकर आना ही संधि विच्छेद कहलाता है।
 किसी शब्द को अलग-अलग भागों में बांटना संधि विच्छेद कहलाता है
उदाहरण के लिए जैसे–
नवागत = नव + आगत
स्वार्थी  =  स्व + अर्थी
महोदय = महा + उदय

संधि की परिभाषा

संधि की परिभाषा :- संधि की परिभाषा उसके अर्थ में निहित होती है तो संधि का शाब्दिक अर्थ हैयोग अथवा मेल “। अर्थात् दो ध्वनियों या दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को ही संधि कहते हैं।

सन्धि (सम् + धि) शब्द का अर्थ है ‘मेल’ या जोड़। दो निकटवर्ती वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है वह संधि कहलाता है। संस्कृत, हिन्दी एवं अन्य भाषाओं में परस्पर स्वरो या वर्णों के मेल से उत्पन्न विकार को भी सन्धि कहते हैं।

सम् + तोष = संतोष
देव + इंद्र = देवेंद्र
भानु + उदय = भानूदय।

संधि की परिभाषा-

  • जब दो वर्ण पास-पास आते हैं या उसके मेल होता हैं तो उनमें जो विकार उत्पन्न होता है अर्थात् वर्ण में परिवर्तन हो जाता है। यह विकार युक्त मेल ही संधि कहलाता है।
  • कामताप्रसाद गुरू के अनुसार, ’दो निद्रिष्ट अक्षरों के आस-पास आने के कारण उनके मेल से जो  विकार होता है, उसे संधि कहते हैं।’
  • श्री किषोरीदास वाजपेयी के अनुसार, ’जब दो या अधिक वर्ण पास-पास आते हैं तो कभी-कभी उनमें रूपांतर हो जाता है। इसी रूपांतर को संधि कहते हैं।’

hi.wikipedia.org

संधि के कितने प्रकार होते हैं | संधि कितने भेदे की होती है

संधि के तीन प्रकार या भेद होते हैं।

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि

स्वर संधि किसे कहते हैं?

यदि संधि के पहले शब्द का अंतिम वर्ण स्वर हो तो “स्वर संधि “कहते हैं यदि किसी वर्ण में स्वर के बाद स्वर आता है और उन दो स्वरों के मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं

देव + आगमन = देवआगमन
रजनी + ईश = रजनीश
स्वर संधि के पांच प्रकार  होते हैं।
1. दीर्घ संधि
2. गुण संधि
3. वृद्धि संधि
4. यण संधि
5. अयादि संधि
  1. दीर्घ संधि

दीर्घ संधि किसे कहते हैं?

जब दो शब्दों की संधि करते समय (अ, आ) के साथ (अ, आ) हो तो ‘आ‘ बनता है, जब (इ, ई) के साथ (इ, ई) हो तो ‘ई‘ बनता है, जब (उ, ऊ) के साथ (उ, ऊ) हो तो ‘ऊ‘ बनता है। इस संधि को हम ह्रस्व संधि भी कह सकते हैं। और Deergh Sandhi दीर्घ संधि भी के सकते है |

 दीर्घ संधि की परिभाषा

दीर्घ का मतलब होता है बड़ा या लंबे अंतराल वाला। यदि किसी संधि के वर्ण में अ,इ,उ स्वर आए तो दोनों को मिलाकर दीर्घ आ’ई’ऊ हो जाता है। यह दीर्घ संधि  कहते है ।
जैसे की
(अ + अ = आ )
धर्म + अर्थ = धर्मार्थ
मत + अनुसार = मतानुसार
स्व + अर्थी = स्वार्थी
आपको यह अभी स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आ रहा होगा। हम आप को समझाने का प्रयास करते हैं। धर्म+ अर्थ में इस शब्द धर्म का अंतिम  वर्ण (अ) है। तथा अर्थ शब्द का प्रथम वर्ण (अ) है।
इस प्रकार (अ) से (अ) मिलकर “आ”हो जाता है। जो उपर्युक्त उदाहरण  मैं स्पष्ट किया गया है।
(अ+आ = आ)
देव + आलय = देवालय
सत्य + आग्रह = सत्याग्रह
शिव + आलय = शिवालय
(आ+अ = आ)
विद्या + आलय = विद्यालय
महा + आनंद = महानंद
महा + आत्मा = महात्मा
नियम के अनुसार दीर्घ संधि में पहले शब्द का दूसरा वर्ण ‘इ ‘हो और दूसरे वर्ण का पहला शब्द हो तो वह शब्द  ” ई “में बदल जाता है
( इ +  इ = ई )
अति + इव = अतीव
कवि + इंद्र = कवींद्र
मुनि + इंद्र = मुनींद्र
(इ + ई = ई)
गिरी + ईश = गिरीश
हरि + ईश = हरीश
परी + ईक्षा = परीक्षा
(ई + इ = ई)
मही + इंद्र = महिंद्र
लक्ष्मी + इच्छा = लक्ष्मीच्छा
(ई + ई = ई)
रजनी + ईश = रजनीश
योगी + ईश्वर = योगीश्वर
नारी + ईश्वर = नारीश्वर
नियम के अनुसार यदि दीर्घ संधि में पहले शब्द का अंतिम वर्ण ‘उ’ हो तो और अंतिम शब्द का प्रथम वर्ण भी ‘उ’ हो तो बड़ा “ऊ” हो जाता है)
(उ + उ = ऊ)
भानु + उदय = भानूदय
गुरु + उपदेश = गुरूपदेश
लघु + उत्तर = लघूत्तर
(उ + ऊ = ऊ)
लघु + उर्मि = लघूर्मि
साधु + ऊर्जा = साधूर्जा
(ऊ + उ = ऊ)
वधू + उत्सव = वधूत्सव
भू + उत्सर्ग = भूत्सर्ग
(ऊ + ऊ = ऊ )
भू + ऊर्जा = भूर्जा
भू + ऊष्मा = भूष्मा

दीर्घ संधि के उदाहरण संस्कृत में :

दीर्घ संधि के कुछ उदाहरण :

योजन + अवधि : योजनावधि (अ + अ = आ)
अ एवं अ इन दोनों स्वरों को मिलाया गया। जब शब्दों की संधि की गयी तो संधि से बनने वाले शब्द में स्वरों के मेल से परिवर्तन देखने को मिला। अतः यह उदाहरण दीर्घ संधि के अंतर्गत आयेगा।

परम + अर्थ : परमार्थ (अ + अ = आ)
जब अ एवं अ दो स्वरों को मिलाया गया तो उन शब्दों ने मिलकर आ बना दिया। जब संधि की गयी तो मुख्य शब्द में परिवर्तन स्वरों की वजह से आया। अतः यह दीर्घ संधि के अंतर्गत आयेगा।

विद्या + अभ्यास : विद्याभ्यास (आ + अ = आ)
दोनों स्वर मिलकर संधि – संधि करने पर परिवर्तन ला रहे हैं। आ एवं अ मिलकर आ बना रहे हैं एवं संधि होने के बाद शब्द में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। ये स्वर हैं अतः यह उदाहरण दीर्घ संधि के अंतर्गत आयेगा।

गिरि + ईश : गिरीश (इ + ई = ई)
जब इ एवं ई इन दोनों स्वरों को मिलाया गया तो इन स्वरों ने मिलकर दीर्घ ई बनायी। जब शब्दों की संधि कि गयो तो इन स्वरों की वजह से परिवर्तन देखने को मिला। अतः यह उदाहरण दीर्घ संधि के अंतर्गत आयेगा।

कवि + ईश्वर : कवीश्वर (इ + ई = ई)
इ और ई ये दो स्वरों को मिलाया गया। जब संधि – संधि होते समय ये दो स्वर मिले तो इन्होने ई बना दिया। जब शब्दों कि संधि की गयी तो मुख्य शब्द में परिवर्तन इन स्वरों कि वजह से देखने को मिला। अतः यह उदाहरण दीर्घ संधि के अंतर्गत आयेगा।

वधु + उत्सव : वधूत्सव (उ + उ = ऊ)
उ एवं उ ये दोनों स्वर संधि के समय मिले। जब इनकी संधि- संधि हुई तो बनने वाले शब्द में इन स्वरों कि वजह से परिवर्तन देखने को मिला। अतः यह उदाहरण दीर्घ संधि के अंतर्गत आयेगा।

दीर्घ संधि के कुछ अन्य उदाहरण :

आत्मा + अवलंबन : आत्मावलंबन (आ + अ = आ)
सर्व + अधिक : सर्वाधिक (अ + अ = आ)
स्व + आधीन : स्वाधीन (अ + आ = आ)

अंड + आकार : अंडाकार (अ + आ = आ)
अल्प + आयु : अल्पायु (अ + आ = आ)

अ+अ     =आ    अन्न+अभाव         =    अन्नाभाव
अ+आ    =आ    भोजन+आलय     =     भोजनालय
आ+अ    =आ    विद्या+अर्थी          =     विद्यार्थी
आ+आ   =आ    महा+आत्मा         =     महात्मा
इ+इ       =ई      गिरि+इंद्र             =     गिरींद
ई+इ       =ई      मही+इंद्र             =     महींद्र
इ+ई       =ई      गिरी+ईश            =     गिरीश
ई+ई       =ई      रजनी+ईश          =     रजनीश
उ+उ      =ऊ     भानु+उदय         =     भानूदय
उ+ऊ     =ऊ     वधू+उत्सव         =     वधूत्सव
ऊ+उ     =ऊ     भू+ ऊर्जा           =      भूर्जा
ऊ+ऊ    =ऊ